बुधवार, 7 मार्च 2018

हिन्दू दर्शन में नारी का स्थान!!

        हमारे गौरवपूर्ण भारतीय संस्कृति के अनुसार नारी शक्ति के मातृ स्वरूप की महिमा विषय पर आज का यह लेख है। नारी हमारे भारतीय समाज मे अनेक स्वरूप में स्थान प्राप्त करती है। वह माँ है, बेटी है, पत्नी है, बहन है परंतु नारी का सबसे ऊँचा स्वरूप मातृ शक्ति के रूप में होता है। हमारे भारतीय दर्शन के अनुसार संसार का हर रिश्ता कोई न कोई स्वार्थ से बंधा होता है, पर माँ और उसके शिशु का रिश्ता बिना किसी स्वार्थ के होता है, और यही कारण है जो नारी शक्ति को सर्वोच्च स्थान प्रदान करता है।
        हमारे वेद, पुराण, दर्शनशास्त्र, स्मृतियां, महाकाव्य, उपनिषद आदि सभी 'माँ' की अपार महिमा के गुणगान से भरे पड़े हैं। असंख्य ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों, पंडितों, महात्माओं, विद्वानों, दर्शनशास्त्रियों, साहित्यकारों और कलमकारों ने भी 'माँ' के प्रति पैदा होने वाली अनुभूतियों को कलमबद्ध करने का सम्पूर्ण प्रयास किया है। इन सबके बावजूद 'माँ' शब्द की समग्र परिभाषा और उसकी अनंत महिमा को आज तक कोई शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाया है।
        हमारे देश भारत में 'माँ' को 'शक्ति' का रूप माना गया है और भगवान शिव को भी शक्ति के बिना शव के रूप में बताया गया है। वस्तुतः वे लिंग भेद से पृथक है पर जब इस संसार मे जीवो की सृष्टि करनी होती है तब उन परबब्रह्म परमेश्वर को भी अर्धनारीश्वर स्वरूप धारण करना पड़ता है। चाहे कोई भी देवता हो बिना अपनी शक्ति के वे शून्य के समान है।


        वेदों में 'माँ' को सर्वप्रथम पूजनीय कहा गया है। इस श्लोक में भी इष्टदेव को सर्वप्रथम 'माँ' के रूप में की उद्बोधित किया गया है-

'त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या च द्रविणम त्वमेव, त्वमेव सर्वमम देव देवः।।'
        वेदों में 'माँ' को 'अंबा', 'अम्बिका', 'दुर्गा', 'देवी', 'सरस्वती', 'शक्ति', 'ज्योति', 'पृथ्वी' आदि नामों से संबोधित किया गया है। इसके अलावा 'माँ' को 'माता', 'मात', 'मातृ', 'अम्मा', 'अम्मी', 'जननी', 'जन्मदात्री', 'जीवनदायिनी', 'जनयत्री', 'धात्री', 'प्रसू' आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है।
ऋग्वेद में 'माँ' की महिमा का यशोगान कुछ इस प्रकार से किया गया है, 

        'हे उषा के समान प्राणदायिनी माँ ! हमें महान सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करो। तुम हमें नियम−परायण बनाओं। हमें यश और अद्धत ऐश्वर्य प्रदान करो।'
सामवेद में एक प्रेरणादायक मंत्र मिलता है, जिसका अभिप्राय है, 

        'हे जिज्ञासु पुत्र! तू माता की आज्ञा का पालन कर, अपने दुराचरण से माता को कष्ट मत दे। अपनी माता को अपने समीप रख, मन को शुद्ध कर और आचरण की ज्योति को प्रकाशित कर।'
        प्राचीन ग्रन्थों में कई औषधियों के अनुपम गुणों की तुलना 'माँ' से की गई है। एक प्राचीन ग्रन्थ में आंवला को 'शिवा' (कल्याणकारी), 'वयस्था' (अवस्था को बनाए रखने वाला) और 'धात्री' (माता के समान रक्षा करने वाला) कहा गया है। राजा बल्लभ निघन्टु ने भी एक जगह 'हरीतकी' (हरड़) के गुणों की तुलना 'माँ' से कुछ इस प्रकार की है-

'यस्य माता गृहे नास्ति, तस्य माता हरितकी।'

        (अर्थात, हरीतकी (हरड़) मनुष्यों की माता के समान हित करने वाली होती है।)
       श्रीमदभागवत पुराण में उल्लेख मिलता है कि 'माताओं की सेवा से मिला आशिष, सात जन्मों के कष्टों व पापों को भी दूर करता है और उसकी भावनात्मक शक्ति संतान के लिए हमेशा सुरक्षा का कवच का काम करती है।' इसके साथ ही श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि 'माँ' बच्चे की प्रथम गुरु होती है।'
रामायण में श्रीराम अपने श्रीमुख से 'माँ' को स्वर्ग से भी बढ़कर मानते हैं। वे कहते हैं-

                                             'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदपि गरीयसी।'

       (अर्थात, जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है।)

        महाभारत में जब यक्ष धर्मराज युधिष्ठर से सवाल करते हैं कि 'भूमि से भारी कौन?' तब युधिष्ठर जवाब देते हैं-

'माता गुरुतरा भूमेरू।'

        (अर्थात, माता इस भूमि से कहीं अधिक भारी होती हैं।)

        महाभारत में अनुशासन पर्व में पितामह भीष्म कहते हैं कि-

       'भूमि के समान कोई दान नहीं, माता के समान कोई गुरु नहीं, सत्य के समान कोई धर्म नहीं और दान के समान को पुण्य नहीं है।'

        इसके साथ ही महाभारत महाकाव्य के रचियता महर्षि वेदव्यास ने 'माँ' के बारे में लिखा है-

'नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।।'

        (अर्थात, माता के समान कोई छाया नहीं है, माता के समान कोई सहारा नहीं है। माता के समान कोई रक्षक नहीं है और माता के समान कोई प्रिय चीज नहीं है।)

        तैतरीय उपनिषद में 'माँ' के बारे में इस प्रकार उल्लेख मिलता है-

'मातृ देवो भवः।'

        (अर्थात, माता देवताओं से भी बढ़कर होती है।)
       संतों का भी स्पष्ट मानना है कि 'माँ' के चरणों में स्वर्ग होता है।' आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी कालजयी रचना 'सत्यार्थ प्रकाश' के प्रारंभिक चरण में 'शतपथ ब्राह्मण' की इस सूक्ति का उल्लेख कुछ इस प्रकार किया है-

'अथ शिक्षा प्रवक्ष्यामः मातृमान् पितृमानाचार्यवान पुरूषो वेदः।'

       (अर्थात, जब तीन उत्तम शिक्षक अर्थात एक माता, दूसरा पिता और तीसरा आचार्य हो तो तभी मनुष्य ज्ञानवान होगा।)
        'माँ' के गुणों का उल्लेख करते हुए आगे कहा गया है-

'प्रशस्ता धार्मिकी विदुषी माता विद्यते यस्य स मातृमान।'

        (अर्थात, धन्य वह माता है जो गर्भावान से लेकर, जब तक पूरी विद्या न हो, तब तक सुशीलता का उपदेश करे।)
         'चाणक्य−नीति' के प्रथम अध्याय में भी 'माँ' की महिमा का बखूबी उल्लेख मिलता है। यथाः

'रजतिम ओ गुरु तिय मित्रतियाहू जान।
निज माता और सासु ये, पाँचों मातृ समान।।'

        (अर्थात, जिस प्रकार संसार में पाँच प्रकार के पिता होते हैं, उसी प्रकार पाँच प्रकार की माँ होती हैं। जैसे, राजा की पत्नी, गुरु की पत्नी, मित्र की पत्नी, अपनी स्त्री की माता और अपनी मूल जननी माता।)

        'चाणक्य नीति' में कौटिल्य स्पष्ट रूप से कहते हैं कि:-

'माता के समान कोई देवता नहीं है। 'माँ' परम देवी होती है।'
         महर्षि मनु ने 'माँ' का यशोगान इस प्रकार किया है-

'दस उपाध्यायों के बराबर एक आचार्य होता है। सौ आचार्यों के बराबर एक पिता होता है और एक हजार पिताओं से अधिक गौरवपूर्ण 'माँ' होती है।'


       महान भारतीय कवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी रचना में 'माँ' की महिम कुछ इस तरह बयां की-

'स्वर्ग से भी श्रेष्ठ जननी जन्मभूमि कही गई।
सेवनिया है सभी को वहा महा महिमामयी'।।

         (अर्थात, माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ कही गई हैं। इस महा महिमामयी जननी और जन्मभूमि की सेवा सभी लोगों को करनी चाहिए।)
        इसके अलावा श्री गुप्त ने 'माँ' की महिमा में लिखा है-

'जननी तेरे जात सभी हम, जननी तेरी जय है।'
        इसी क्रम में रामचरित उपाध्याय ने अपनी रचना 'मातृभूमि' में कुछ इस प्रकार 'माँ' की महिमा का उल्लेख किया है-

                                               'है पिता से मान्य माता दशगुनी, इस मर्म को,
                                                    जानते हैं वे सुधी जो जानते हैं धर्म को।'

        (जो बुद्धिमान लोग धर्म को मानते हैं, वे जानते हैं कि माता पिता से दस गुनी मान्य होती है।)
इसके साथ ही 'माँ' के बारे में एक महाविद्वान ने क्या खूब कहा है, 

'कोमलता में जिसका हृदय गुलाब सी कलियों से भी अधिक कोमल है तथा दयामय है। पवित्रता में जो यज्ञ के धुएं के समान है और कर्त्तव्य में जो वज्र की तरह कठोर है−वही दिव्य जननी है।'
          नारी इस सृष्टि और प्रकृति की 'जननी' है। नारी के बिना तो सृष्टि की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसी शाश्वत सत्य को हरियाणा के सिरमौर कवि पं. मांगे राम ने अपने प्रख्यात साँग 'शकुन्तला−दुष्यन्त' में कुछ इस प्रकार समाहित किया है-

'स्त्री ना होती जग म्हं, सृष्टि को रचावै कौण।
ब्रह्मा विष्णु शिवजी तीनों, मन म्हं धारें बैठे मौन।
एक ब्रह्मा नैं शतरूपा रच दी, जबसे लागी सृष्टि हौण।'

        (अर्थात, यदि नारी नहीं होती तो सृष्टि की रचना नहीं हो सकती थी। स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश तक सृष्टि की रचना करने में असमर्थ बैठे थे। जब ब्रह्मा जी ने नारी की रचना की, तभी से सृष्टि की शुरूआत हुई।)

देवी अपराध क्षमापना स्तोत्र में एक श्लोक आता है:-

"कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥"

        (अर्थात पुत्र कुपुत्र कदाचित हो भी जाये पर माता कभी कुमाता नही होती)
       
        कुल मिलाकर, हमारी भारतीय संस्कृति नारी शक्ति की स्वरूप जननी 'माँ' की अपार महिमा का यशोगान करता है। भारीतय धर्म और संस्कृति में 'माँ' के अलौकिक गुणों और रूपों का उल्लेखनीय वर्णन मिलता है। हिन्दू धर्म में देवियों को 'माँ' कहकर पुकारा गया है। धार्मिक परम्परा के अनुसार धन की देवी 'लक्ष्मी माँ', ज्ञान की देवी 'सरस्वती माँ' और शक्ति की देवी 'दुर्गा माँ' मानीं गई हैं। नवरात्रों में 'माँ' को नौ विभिन्न रूपों में पूजा जाता है। 

        नारी है तो हमारा अस्त्तित्व है नारी के बिना इन सृष्टि की कल्पना भी नही की जा सकती। अतः हर प्रकार रूप में काहे वह माँ हो बहन हो बेटी हो पत्नी हो नारी सदैव आदर-सम्मान के योग्य है। वह समाज जहां नारी का सम्मान नही होता उस समाज का पतन निश्चित है। नारी जहाँ भी रहे वह उस स्थान को स्वर्ग बना देती है।

रविवार, 14 जनवरी 2018

बाल्यकाल में एक मदारी ने कराई थी हनुमानजी की श्रीराम से भेंट!!


हम सभी जानते है कि हनुमानजी श्रीराम के अनन्य भक्त है और मानस के अनुसार उनकी प्रथम भेंट ऋषिमुख पर्वत पर हुई थी। परंतु एक कथा और भी प्रचलित है जिसमे श्रीराम और हनुमान बाल्यकाल में भी कुछ समय साथ मे व्यतीत किये है।

एक बार की बात है, श्रीहनुमान जी के मन मे, जो कि साक्षात रुद्र के अवतार है, बाल्यकाल में श्रीराम से मिलने की उत्कट उत्कंठा हुई। उन्होंने अपनी माँ अंजनी से कहा तो माता ने शिव जी की आराधना करने को कहा। हनुमान जी तुरंत शिवलिंग का निर्माण कर श्रद्धा भाव से उनके भजन पूजन में लग गए। उधर शिवजी ने देखा कि हनुमान श्रीराम से मिलने की कामना लिए मेरी भक्ति कर रहा है, तो शिवजी हनुमान के सामने प्रकट हुए और बालक हनुमान से कहने लगे कि- कहो वत्स तुम किस कामना को मन मे लिए मेरी भक्ति कर रहे हो। हनुमानजी ने शिवजी को प्रणाम कर श्रीराम से मिलने की अपनी इच्छा प्रकट की। तब शिवजी ने कहा कि एक उपाय है जिससे हम दोनों उनके बाल स्वरूप के दर्शन कर सकते है। हनुमानजी ने कहा कि बताइये प्रभु मैं कैसे उनसे मिल सकता हूँ। 

तब शिवजी ने कहा कि तुमने वानर के रूप में अवतार लिया है तो वानर रूप में ही उनके पास चलो और मैं तुम्हे नचाने वाला मदारी बन कर उनके पास ले जाऊंगा। तब शिवजी डमरू बजाते हुए एक मदारी का वेश बनाकर हनुमान जी को नचाते हुए अयोध्या ले गए और दशरथ जी के महल के सामने जोर जोर से डमरू बजाने लगे। उधर श्रीराम ने जब देखा कि उनके प्रभु शिवजी स्वयं उनसे मिलने के लिए एक मदारी बनकर आये है और साथ मे उनके परम भक्त हनुमानजी को भी साथ लेकर आये है, तब उन्होंने माता कौशल्या से उस मदारी का खेल देखने की इच्छा व्यक्त की। माता ने अनुमति दे दी और चारो भाई मदारी का खेल देखने महल के बाहर आ गए। अब शिवजी डमरू बजाते और हनुमानजी अन्य वानरो की भांति नृत्य करते। इसप्रकार श्रीराम और हनुमान जी की भेंट शिवजी ने बाल्यकाल में ही करा दी थी।

जब खेल समाप्त हुआ और मदारी बने शिवजी हनुमानजी को लेकर अयोध्या से वापस हुए, तब श्रीराम उदास हो गए और भोजन का त्याग कर दिया, माता कौशल्या को जब यह बात पता चली तब उन्होंने राज वैद्य को बुलवाया पर वैध के पल्ले भी कुछ बात नही पड़ी और रामजी उदास के उदास ही बने रहे। फिर माता कौशल्या ने श्रीराम से उनकी उदासी का कारण पूछा तब उन्होंने कहा कि मुझे एक बन्दर चाहिए। माता ने तुरंत सेवकों को आज्ञा दी सेवको ने बहुत सारे वानर ला दिए, पर श्रीराम किसी भी वानर को देख कर प्रसन्न नही हुए। अंत मे जब यह बात वशिष्ठ जी को पता चली, तो उन्होंने अपने योग के प्रभाव से ध्यान लगाकर सब बात जान लिया और सेवको को आज्ञा दी कि किष्किंधा में जाकर अंजनी के पुत्र को ले आओ तो राम के शोक का निवारण हो जाएगा। तब सेवको ने जाकर हनुमान जी को लाया और श्रीराम का शोक दूर हुआ। इस प्रकार हनुमान जी बाल्यकाल में कुछ समय तक श्रीराम के साथ अयोध्या में ही निवास किये और विविध लीलाएं की। 

श्रीराम की पतंग जो उड़ते हुए स्वर्ग तक पहुँच गई!!

श्रीरामावतार में प्रभु जब अपनी बाल लीला कर रहे थे, तब एक बार मकर संक्रांति के दिन अयोध्या के राजा दशरथ जी अपने चारो पुत्रों-राम, भारत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न को साथ लेकर सरजू नदी के पावन तट पर पहुँचे। वहां मकर संक्रांति का उत्सव चल रहा था। अयोध्या वासी नर-नारी सभी संक्रांति पर सरजू स्नान और दान-पुण्य आदि कर रहे थे, साथ ही वहाँ एक विशाल मेले का भी आयोजन था। छोटे बच्चे सरजू के किनारे पतंग लेकर खेल रहे थे। तभी श्रीराम ने भी उन बच्चो को पतंग उड़ाते देख कर अपने पिता दशरथ जी से पतंग उड़ाने की इच्छा व्यक्त किये। दशरथ जी ने मेले से चार सुंदर पतंग लेकर चारो भाइयो को दे दिए।

फिर चारो भाई अपनी अपनी पतंग लेकर सरजू नदी के किनारे उड़ाने लगे। सबसे कम ऊंचाई पर शत्रुघ्न जी का पतंग, फिर उससे ऊपर लक्ष्मण जी का, फिर भरत जी का और फिर सबसे ऊपर श्रीराम का पतंग उड़ रहा था। कथा आती है कि श्रीराम का पतंग उड़ते उड़ते स्वर्ग लोक तक जा पहुंचा। स्वर्ग में देवराज इंद्र के बेटे जयंत की पत्नी ने जब देखा कि यह कैसी विचित्र बात है कि पृथ्वी लोक का यह पतंग उड़ता हुआ यहाँ देवलोक तक आ गया। कौतूहल वश जयंत की पत्नी ने उस पतंग को अपने पास यह सोचकर रख लिया कि पतंग जिसका होगा वह इसे लेने अवश्य ही आएगा तो मै उस अद्भुद मानव को देख भी लूँगी।

उधर धरती पर जब श्रीराम ने देखा कि सभी भाइयो की पतंग वापस आ गई, पर उनका पतंग नही अब तक वापस नही आया तब उन्होंने लौकिक व्यवहार करते हुए अपने मुख मण्डल पर निराशा के भाव लाते हुए अपने प्रिय दास हनुमानजी को (हनुमान जी का श्रीराम से बाल्यावस्था में मिलने की कथा जानने के लिए यहाँ क्लिक करें) कहा कि हे हनुमान हमारे सभी भाइयो के पतंग वापस आ गए पर मेरी पतंग अभी तक वापस नही आई तुम जाकर देखो। 

हनुमानजी तो हमेशा राम काज करने को आतुर रहते है। जैसे ही उन्हें श्रीराम ने पतंग का पता लगाने को कहा, तुरंत आकाश की तरफ वायु वेग से दौड़ पड़े और उड़ते-उड़ते स्वर्ग पहुंच गए। बहुत ढूंढने के बाद जब उन्हें पता चला कि श्रीराम की पतंग इन्द्र पुत्र जयंत की पत्नी के पास है, तब हनुमान जी जयंत की पत्नी के पास पहुंच कर पतंग उन्हें देने के लिए निवेदन किये। जयंत की पत्नी ने हनुमान जी से पूछा कि क्या यह पतंग आपकी है? हनुमान जी ने कहा नही!! यह पतंग मेरी नही है। तब जयंत की पत्नी ने कहा फिर आप इसे क्यो लेने आये है, जाइये और जिसकी पतंग है उसे ही भेजिए। जब तक मैं उस अनुपम पुरुष के दर्शन न कर लूं मै पतंग नही दूँगी। हनुमान जी ने सोचा कि ये देवी तो पतंग बिना श्रीराम के दर्शन किये देंगी नही, तो क्यो ना श्रीराम से ही निवेदन करू की स्वर्ग आकर इस देवी को दर्शन दे दे और पतंग ले जाये। 

मन मे विचार कर हनुमान जी वापस सरजू तट पर आ गये और श्रीराम को पूरी बात बताकर साथ स्वर्ग चलने को कहा। श्रीराम ने हनुमान जी से कहा कि हनुमान अभी हम स्वर्ग नही जा सकते तुम जाकर उस देवी से कहना कि वो हमारा पतंग वापस कर दे और चित्रकूट में जब हम सीता सहित निवास करेंगे तब अवश्य ही उस देवी को दर्शन देंगें। हनुमानजी ने स्वर्ग जा कर जयंत की पत्नी से सारी बात कही, तो उसने पतंग वापस कर दिया। हनुमान जी पतंग को लेकर वापस सरजू तट पर आए और श्रीराम को वह पतंग सौप दी। इसप्रकार श्रीराम की अनेक बाल लीलाओं में से एक यह मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की लीला भी रसिक भक्तो के मन को मुग्ध कर देती है।

भाव पक्ष:- इस लीला में श्रीराम ईश्वर तत्व है, जयंत की पत्नी माया है, पतंग जीव है और  हनुमानजी महराज सद्गुरु है। संसार के प्रत्येक जीव रूपी पतंग की डोर तो उस ईश्वर के ही हाथ मे है, पर जब जीव की महत्वकांक्षा बढ़ती जाती है और वह ईश्वर से विमुख होकर अपने कामनाओ के पीछे भागना प्रारम्भ करता है, तब वह उड़ता हुआ ईश्वर से बहुत दूर निकल जाता है, और माया के बंधन में जाकर पूरी तरह जकड़ जाता है, माया के बंधनों में बंधा हुआ यह जीव जब माया के बंधनों से मुक्त होने के लिए उस परम पिता परमेश्वर को आर्त भाव से पुकारता है, तब वे  ईश्वर करुणा करके हनुमान जी के समान ही किसी अपने भक्त को सद्गुरु बनाकर भेजते है और वह सद्गुरु हमे इस माया के बंधन से मुक्त कराकर वापस उन्ही भगवान के श्रीचरणों में समर्पित कर देता है। 

अतः जीव को चाहिए कि वह अपने इस जीवन रूपी पतंग की डोर को हमेशा भगवान से जोड़े रखे। जीवन मे चाहे कितनी भी सफलता मिले पर कभी भगवान से विमुख नही होना चाहिए। अपनी सफलता को उस भगवान की कृपा मानकर हमेशा उनके श्रीचरणों में अपनी प्रीति बनाए रखना चाहिए।

।।जय श्रीराम।।

शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

भगवान शिव के ग्यारह रुद्रों की उत्पत्ति कैसे हुई!!


शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव के 11 रुद्र अवतार हुए हैं। इनकी उत्पत्ति की कथा इस प्रकार है-
एक बार देवताओं और दानवों में युद्ध छिड़ गया। इसमें दानव जीत गए और उन्होंने देवताओं को स्वर्ग से बाहर निकाल स्वर्ग पर अपना अधिकार कर लिया, हारे हुए सभी देवता बड़े दु:खी मन से अपने पिता कश्यप मुनि के पास गए। उन्होंने पिता को अपने दु:ख का कारण बताया और उनसे अपना राज पाठ वापस दिलाने के लिए प्रार्थना की। कश्यप मुनि परम शिवभक्त थे। उन्होंने अपने पुत्रों को आश्वासन दिया और काशी जाकर भगवान शिव की पूजा-अर्चना शुरु कर दी। उनकी प्रगाण भक्ति देखकर भगवान भोलेनाथ अत्यंत प्रसन्न हुए और दर्शन देकर वर मांगने को कहा। 

कश्यप मुनि ने देवताओं की भलाई के लिए उनके यहां पुत्र रूप में आने का वरदान मांगा।  भगवान शिव ने कश्यप को वर दिया और वे उनकी पत्नी सुरभि के गर्भ से ग्यारह रुपों में प्रकट हुए। यही ग्यारह अवतार रुद्र कहलाए। ये देवताओं के शोक के निवारण के लिए प्रकट हुए थे इसीलिए इन्होंने देवताओं को पुन: स्वर्ग का राज दिलाया। धर्म शास्त्रों के अनुसार यह ग्यारह रुद्र सदैव देवताओं की रक्षा के लिए स्वर्ग में ही रहते हैं।

ग्यारह रुद्रों के नाम इसप्रकार हैं-
1- कपाली 
2- पिंगल 
3- भीम 
4- विरुपाक्ष 
5- विलोहित 
6- शास्ता 
7- अजपाद 
8- अहिर्बुधन्य 
9- शंभु 
10- चण्ड 
11- भव

शनिवार, 20 मई 2017

हम जानते है पर मानते नहीं!!

संसार का यह नियम है की जब तक किसी व्यक्ति या वस्तु के बारे में हम जान न ले उसके प्रति श्रद्धा उत्पन्न नहीं होती। गोस्वामीजी ने भी मानस में कहा है क़ि:-

"जाने बिनु न होई परतीती। बिनु परतीति होई नहिं प्रीती॥"

अब प्रश्न यह उठता है की क्या हम उस भगवान् के बारे में नहीं जानते? क्या हमें यह नहीं पता की भगवान् होते है? क्या हमें नहीं पता की भगवान् से ही यह सम्पूर्ण सृष्टि का सृजन, पालन और संहार होता है? क्या हम यह नहीं जानते की भगवान् हमारे ह्रदय में हमेशा निवास करते है? क्या हम नहीं जानते की भगवान् हमारे द्वारा किये गए प्रत्येक कर्मो को जानते है और उन कर्मो के हिसाब से फल प्रदान करते है?

ऐसे अनेक से प्रश्न है जिनके बारे में हम सभी प्रायः अपने माता-पिता, गुरुजनो, कथा वाचको, पुराणों, वेदों आदि के माध्यम से श्रवण मनन और चिंतन करके कुछ न कुछ हम समझते है, जानते है।

हम सभी किस न किसी प्रकार से भगवान् की भक्ति करते है पर चिंतन का विषय यह है की उस भक्ति का प्रयोजन क्या है? क्या हम यह भक्ति अपनी कामनाओ के पूर्ति के लिए करते है? अथवा भगवान् को प्राप्त करने के लिए? 

आहार निद्रा भय मैथुन ये सभी जीवो में होता है पर मनुष्य को भगवान् ने सोचने समझने की शक्ति प्रदान की है और हम उस शक्ति का प्रयोग कर उस भगवान् रुपी परामानंद को जानने का प्रयत्न कर सकते है अथवा यदि उस आनंद कन्द भगवान् की कृपा हम पर हो गई तो हम उसे जान भी सकते है। 

प्रायः हम सभी भगवान् के बारे में बहुत कुछ जानते है पर क्या हम भगवान् को मानते है? वस्तुतः यह प्रश्न बहुत जटिल है। नास्तिक व्यक्ति की पहचान करना बहुत आसान है पर आस्तिकता के पीछे जो नास्तिकता छुपी हुई है उसका पहचान कर पाना बहुत कठिन है। हम सभी वेदों, पुराणों, उपनिषदों, और एनी धार्मिक ग्रंथो में लिखी हुई बातो को समझते है, उन बातो को जानते है पर उस जानने का दायरा क्या है? क्या हम उसे एक सिद्धांत के रूप में जानते है अथवा उसे अपने व्यवहारिक जीवन में भी आत्मसात करते है। आज हमें कथाओ के माध्यम से हो अथवा रास्ते चलते ट्रेनों या बसो में हो बहुत से ऐसे लोग मिल जाएंगे जो आप को 10 मिनट में ज्ञान की बड़ी बड़ी बातें कर भगवान् से मिलाने का दावा कर दे। पर कभी वो ज्ञानी व्यक्ति स्वयं अपने व्यवहार जगत में उन सिद्धान्तों का पालन करते है अथवा नहीं। आज इस ब्लॉग के माध्यम से हम लोग भी आप तक कुछ न कुछ भगवत तत्व के बारे में पहुचाने का प्रयास करते है पर यह भी सत्य है की हम खुद भी अपने द्वारा कही गई सभी सैद्धांतिक बातो को अपने व्यवहारिक जगत में नहीं उतार पाते। कहने का तात्पर्य केवल इतना है की हम सभी सिद्धान्ततः तो बहुत कुछ जानते है की धर्म के अनुसार क्या अच्छा है और क्या बुरा है पर जब उसे मानने की पारी आती है तब हम उन धर्म-शस्त्रो में लिखी बात को न मान कर अपने मन के अनुसार चलने लगते है क्योकि मन हमारे कामनाओ को जो अनुकूल हो ऐसी बातें करता है अर्थात हमारा मन हमारे कामनाओ के वश में है और यह वही कार्य करता है जिससे हमारी कामनाये पुष्ट हो। भगवान् की भक्ति हो अथवा धर्म कर्म के प्रति श्रद्धा इन बातो का सैद्धांतिक ज्ञान के साथ साथ व्यवहारिक आचरण भी परम आवश्यक है। अतः आप अपने भगवान् धर्म आदि के बारे में जाने सुने सोचे मनन करे चिंतन करे लोगो को बताये उनको जागरूक करे सभी बाते बहुत अच्छी है पर इन बातो के साथ साथ उन बातो को अपनी व्यवहारिक जीवन में अवश्य उतारे तभी उसका परम लाभ मिल पायेगा वरना आप का किया गया सारा परिश्रम व्यर्थ है।

शुक्रवार, 19 मई 2017

लंका भवसागर है!!

हम सभी ने मानस अथवा रामायण का श्रवण मनन या चिंतन किया है। उन्ही में से एक दृष्टान्त स्वरुप संक्षिप्त में विभीषण जी की कथा पर चिंतन करते है रामायण में लंका नाम की एक नागरी का उल्लेख मिलता है जहा रावण नाम का एक राक्षस राज्य करता था। उसका एक छोटा भाई विभीषण था जो की राम भक्त था। विभीषण जी राक्षस होते हुए भी स्वभावतः साधू थे परंतु उस लंका नागरी में रहने के कारण उन्हें चारो तरफ से आसुरी प्रवृत्ति वाले लोगो से घिरे थे। रावण ने अपनी लंका नागरी में अपनी छोड़ अन्य किसी के पूजन पर प्रतिबन्ध लगा रखा था। अतः विभीषण जी श्रीराम के आयुधों का चिन्ह अपने घर पर अंकित कर और तुलसी का बिरवा लगा कर भगवान् की आराधना करते थे। एक दिन माता सीता की खोज करते हुए वहा हनुमान जी आये और उन्होंने विभीषण जी को श्रीराम के स्वरुप का बोध कराया। हनुमान जी के सत्संग का परिणाम यह निकला की विभीषण जी उस लंका नगरी और अपने भाई रावण को छोड़ कर श्रीराम के शरण में चले गए अपना कल्याण कर लिया।

वास्तव में विभीषण है हम सभी जीव और लंका है यह संसार रुपी भवसागर जिसमे यह विभीषण रुपी जीव रावण आदि अनेक रिश्तेदारो और कामनाओ से घिरा होता है पर यदि उस जीव की थोड़ी भी भगवान् के प्रति श्रद्धा है तो हनुमानजी जैसे सच्चे संत का सत्संग उसे प्राप्त अवश्य होता है और उस सत्संग के प्रभाव से श्रीराम के दर्शन और परमानंद का लाभ अवश्य प्राप्त होता है।

गुरुवार, 18 मई 2017

चारो युग कहाँ स्थापित होते है!!

हम सभी चार युग-सत्य, त्रेता, द्वापर और कलियुग से भली भाँति परिचित है। ये एक समयावधि होती है जब तक इन युगों का प्रभाव होता है। मानस में गोस्वामी जी ने भी चारो युगों के प्रभाव को बताया है की सत्ययुग में ध्यान से, त्रेता में यज्ञ से, द्वापर में पूजन से और कलियुग में श्रीराम नाम से जीव मात्र का कल्याण होता है।

वस्तुतः ये लक्षण युगों में पृथक पृथक बताया गया है। परंतु भावनात्मक दृष्टि से यदि देखे तो हर मनुष्य के जीवन में ये चारो युगों का निवास होता है। जब हम भगवान् के ध्यान में अपने चित्त को स्थापित करते है तब हमारे जीवन में सत्ययुग का प्रादुर्भाव होता है। जब हम भगवान् के निमित्त यज्ञ आदि कर्म करते है तब हमारे जीवन में त्रेतायुग का प्रादुर्भाव होता है। जब हम भगवान् का पूजन करते है तब हमारे जीवन में द्वापरयुग का प्रादुर्भाव होता है। जब हमारे जीवन में भगवन्नाम संकीर्तन आता है तब वास्तव में हम कलियुग में निवास करते है। परंतु इन चारो आचरणों को करने वाले लोग इस कलियुग में बहुत विरले है। इस युग में तो कलियुग के दूसरे लक्षण से संपन्न लोगो की बाहुल्यता है यथा कलह, ईर्ष्या, द्वेष, मद, मात्सर्य आदि। जब इस तरह के प्रवृत्ति हमारे आचरण में आती है तब हमारा जीवन कलियुग के दुःस-प्रभाव से ग्रसित हो जाता है। अतः यदि मनुष्य चाहे तो किसी भी युग में किसी भी जन्म में अपनी भाव वृत्तियों के आधार पर अपने जीवन में सत्य, त्रेता, द्वापर और कलियुग के लक्षण युक्त प्रभावो को अपनाकर अपने जीवन को सार्थक बना सकता है।

जीव तीन तरह की तृष्णाओ से घिरा होता है!!

प्रत्येक जीव प्रायः तीन प्रकार की तृष्णाओ से घिरा होता है:-वित्तेषणा, पुत्रेष्णा, लोकेषणा।

वित्तेषणा का अर्थ है धन प्राप्ति की इच्छा। प्रत्येक मनुष्य अपने जीवनोपार्जन के लिए धन का अर्जन करने में लगा होता है। क्योकि कामनाये अनंत है और एक पूरी होने पर दूसरी कामना पैदा हो जाती है पर संतुष्टि नहीं मिलती। अतः जीव वित्तेषणा के पीछे अपना सारा जीवन बेकार कर जाता है। 

पुत्रेष्णा का अर्थ है पुत्र प्राप्ति की इच्छा। हर मनुष्य अपने वंश वृद्धि के लिए एक पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखता है। यदि ना हो तो वह अपने को अभागा मानता है और सारा जीवन इसी ग्लानि में बीता देता है। जिन्हें पुत्र है वो सारा जीवन उसके लालन पालन और भरण पोषण की व्यवस्था में बीता देता है। यदि पुत्र किसी गलत आचरण में लिप्त हो गया तो जीवन आत्म ग्लानी में  बीता देता है।

लोकेषणा का अर्थ होता है प्रसिद्धि। जब मनुष्य के पार पर्याप्त धन सम्पदा आ जाती है और उसे कुछ भी पाना शेष नहीं होता है साथ ही पुत्र पौत्र से भी घर आनंदित होता है तब उसे तीसरे प्रकार की तृष्ण अर्थात लोकेषणा से ग्रसित हो जाता है। जब धन सम्पदा और पुत्र पौत्र से घर संपन्न हो जाता है तब उसे प्रसिद्धि की इच्छा होने लगती है की कैसे भी हो लोग उसे जाने। इसके लिए वह अनेक प्रकार के यत्न करता है क़ि कैसे भी हो उसका समाज में मान सम्मान बढे। फिर वह किसी के थोड़े से सम्मान से भी गर्व का अनुभव करता है और कोई ज़रा से कुछ गलत बोल दे तो अपना घोर अपमान समझता है।

इस प्रकार इन तीन तृष्णाओ से प्रत्येक मनुष्य घिरा होता है और भगवान् से विमुख होकर अपना जीवन व्यर्थ कर बैठता है।

मंगलवार, 16 मई 2017

श्रीराम पर लिखे गए है सबसे ज्यादा ग्रन्थ!!

श्रीराम पर लिखा गया सबसे पहला और प्रामाणिक ग्रन्थ है रामायण जिसे आदिकवि महर्षि वाल्मीकि ने श्रीराम के जन्म के पूर्व ही लिख दिया था। इसीलिए इस ग्रंथ को सबसे प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। यह मूल संस्कृत में लिखा गया ग्रंथ है। कलियुग में रामचरित मानस को गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा जिनका जन्म संवत्‌ 1554 को हुआ था। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना अवधी भाषा में की। रामायण और मानस दोनों ही सर्वप्रचलित ग्रन्थ है पर इसके अलावा भी श्रीराम पर अनेक संतो और कवियों ने लिखा है। आइये जाने अब तक प्रमुख रूप से कितनी भाषाओ में प्रमाणित ग्रन्थ श्रीराम पर लिखे गए है:-

महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण (मूल संस्कृत में),
गोस्वामी तुलसीदास कृत राम चरित मानस (अवधि में),
 तमिल भाषा में कम्बन रामायण, 
असम में असमी रामायण, 
उड़िया में विलंका रामायण, 
कन्नड़ में पंप रामायण, 
कश्मीर में कश्मीरी रामायण,
 बंगाली में रामायण पांचाली, 
मराठी में भावार्थ रामायण। 
कंपूचिया की रामकेर्ति या रिआमकेर रामायण, 
लाओस फ्रलक-फ्रलाम (रामजातक), 
मलेशिया की हिकायत सेरीराम, थाईलैंड की रामकियेन और 
नेपाल में भानुभक्त कृत रामायण आदि प्रचलित हैं। 

इसके अलावा भी अन्य कई देशों में वहां की भाषा में रामायण लिखी गई है।

सोमवार, 15 मई 2017

रामायण का गान सबसे पहले किसने किया?


हम सभी जानते है की श्रीराम पर लिखा गया सबसे पहला महाकाव्य रामायण है जिसे महर्षि वाल्मीकि ने श्रीराम जन्म के पूर्व ही संस्कृत भाषा में लिखा था। पर क्या आप जानते है की सबसे पहले इस राम कथा का गान सार्वजानिक रूप से कब और किसके द्वारा किया गया?

श्रीराम ने जब माता सीता को वन जाने को कहा तब माता सीता गर्भ से थी। लक्ष्मण जी ने उन्हें महर्षि वाल्मीकि के आश्रम के निकट वन में छोड़ दिया। वाल्मीकि ने जब यह जाना तो उन्होंने माता सीता को अपने आश्रम में आश्रय दिया। कालान्तर में माता सीता ने लव-कुश नाम के दो दिव्य बालको को जन्म दिया। 

महर्षि वाल्मीकि ने श्रीराम के चरित्रो पर रामायण नाम के महाकाव्य की रचना की थी पर उस महाकाव्य को किसी को भी बताया या सुनाया नहीं था। सबसे पहले महर्षि ने यह दिव्य काव्य श्रीराम के सुपुत्र लव-कुश को सुनाया और इसे छन्दबद्ध तरीके से गाना सिखाया। श्रीराम जब यज्ञ कर रहे थे तब लव और कुश को महर्षि ने आज्ञा दी की तुम दोनों जाकर अयोध्या के निकट इस महाकाव्य के छन्दों का गान करो। 

महर्षि की आज्ञा पा कर दोनों भाई अयोध्या चले गए और श्रीराम चरित्र का गान करना प्रारम्भ किया। जब अयोध्या वासियो ने इस दिव्य चरित्र को सूना तो वे अत्यंत आनंदित हुए। जब यह बात श्रीराम को पता चली तब उन्होंने उन दोनों बालको को अपने राज दरबार में बुलाया और उनसे उस महाकाव्य के बारे में पूछा। 

तब दोनों भाइयो ने कहा की हे महाराज हमारे गुरुदेव ने इस महाकाव्य की रचना की है जिसमे सम्पूर्ण रामकथा को कहा गया है। श्रीराम सहित सभी सभासदों ने लव-कुश से उस महाकाव्य का सम्पूर्ण गायन करने का आग्रह किया। इसप्रकार सबसे पहले श्रीराम के सामने ही उन्ही के पुत्र लव-कुश ने सम्पूर्ण श्रीरामकथा का गान किया था। लव-कुश ने राम कथा गान करने के बाद अंत में गाया था:-

"हे पितु भाग्य हमारे जागे।
राम कथा कही राम के आगे।।"

।।जय श्रीसीताराम।।

रविवार, 14 मई 2017

राम जन्म से पूर्व लिखी जा चुकी थी रामायण।

हम सभी श्रीराम के पावन चरित्रो पर लिखी हुई रामायण से भली भाँति परिचित है। श्रीराम का जन्म त्रेतायुग में हुआ था। वे भगवान् विष्णु के अवतार माने जाते है। पर क्या आप जानते है क़ि रामायण की रचना कब हुई थी?

श्रीराम पर वैसे तो अनेक ग्रंथो की रचना अनेक भाषाओ में की गई है। परंतु श्रीराम के चरित्रो को सबसे पहले लिखा था महर्षि वाल्मीकि ने। महर्षि वाल्मीकि त्रेतायुग में जन्मे श्रीराम के समकालीन कवी थे। बचपन में चोर रहे वाल्मीकि ने नारद जैसे सदगुरु का संग पा कर और भगवान् की भक्ति कर महर्षि हो गए। उनको तीनो काल में देखने की शक्ति प्राप्त हो गई। श्रीराम जन्म के पूर्व ही उन्होंने भविष्य में होने वाले रामजन्म और उनकी पावन लीलाओ को एक महाकाव्य जिसे आज हम "रामायण" के रूप में जानते है की रचना कर दी थी। उन्होंने  रामायण की रचना संस्कृत में की थी। वर्तमान में श्रीराम पर अनेक काव्यों की रचना की गई है पर सर्वप्रथम महर्षि वाल्मीकि ने ही श्रीराम जन्म के पूर्व रामायण के माध्यम से श्रीराम के चरित्रो को छन्दबद्ध किया था।

शनिवार, 13 मई 2017

वानर सेना ने सेतु का निर्माण कितने दिनों में किया?

हम सभी जानते है की जब माता सीता की खोज हनुमानजी महराज ने की तब श्रीराम वानर-भालुवों की सेना लेकर लंका की ओर चल पड़े। मार्ग में 100 योजन विस्तार वाला विशाल समुद्र था जिसके उस पार लंका नाम की नगरी थी। श्रीराम ने समुद्र की उपासना की पर वह कोई सहायता नहीं कर सका इस पर श्रीराम कुपित होकर समुद्र को सुखाने को अपने धनुष में बाण का संधान किया। तब समुद्र ने प्रकट हो कर श्रीराम से क्षमा याचना की और समुद्र पर नल-नील की सहयता से पुल बनाने का उपाय सुझाया। इस प्रकार वानर-भालुवों ने मिल कर सेतु बनाने का कार्य प्रारम्भ किया। पर क्या आप जानते है की वानर-भालुवों की सेना ने कितने दिन में सेतु बंधन का कार्य किया?

रामायण के अनुसार समुद्र पर पुल बनाने में वानर-भालुवों की सेना को पांच दिन का समय लगा। पहले दिन वानरों ने 14 योजन, दूसरे दिन 20 योजन, तीसरे दिन 21 योजन, चौथे दिन 22 योजन और पांचवे दिन 23 योजन पुल बनाया था।

 इस प्रकार कुल 100 योजन लंबाई का पुल समुद्र पर बनाया गया। रामायण कालीन यह पुल पूरी तरह से पत्थरो से बनाया गया था। श्रीराम कृपा के प्रताप से सारे पत्थर समुद्र के जल में तैर रहे थे। यह पुल 10 योजन चौड़ा था। (एक योजन लगभग 13 किमी होता है)

शुक्रवार, 12 मई 2017

चौदह मन्वन्तरों में होते है भगवान् के ये चौदह मनु अवतार!!

चारो युग जब एक हजार बार व्यतीत हो जाए तो उस काल को एक कल्प कहते है और यह एक कल्प ब्रह्माजी का एक दिन होता है। ब्रह्मा जी के एक दिन अर्थात एक कल्प में चौदह मन्वन्तर होते है और प्रत्येक मन्वन्तर में एक मनु होते है जो एक मन्वन्तर अर्थात इकहत्तर चतुर्युगी तक इस विश्व का पालन करते है। 

भगवान प्रत्येक मन्वन्तर में मनु के रूप में अवतार लेते है। वर्तमान में वाराह कल्प चल रहा है जिसके सात मनु हो चुके है और सात मनु आगे होंगे। आइये जाने उन मनुवो के नाम क्या है:-
1 स्वायम्भुव मनु।
2 स्वारोचिष मनु।
3 उत्तम मनु।
4 तामस मनु।
5 रैवत मनु।
6 चाक्षुस् मनु।
7 वैवस्वत मनु।
8 सावर्णि मनु।
9 दक्षसावर्णि मनु।
10 ब्रह्मसावर्णि मनु।
11 धर्मसावर्णि मनु।
12 रुद्रसावर्णि मनु।
13 देवसावर्णि मनु।
14 इन्द्रसावर्णि मनु।

वर्तमान में इस कल्प का सातवाँ मन्वन्तर चल रहा है जिसमे विवश्वान (सूर्य) के पुत्र वैवस्वत (श्राद्धदेव) मनु हुवे है।

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गुरुवार, 11 मई 2017

दासी पुत्र से कैसे देवर्षि बने नारद!! नारद जी के जन्म की कथा!!

देवर्षि नारद पहले उपबर्हण नाम के गन्धर्व थे। एक बार ब्रह्माजी की सभा में सभी देवता और गन्धर्व भगवन्नाम का संकीर्तन करने के लिए आये। नारदजी भी अपनी पत्नियो के साथ वहा पर आये और सभा में विनोद (हास्य-परिहास्य) करने लगे। ब्रह्माजी ने संकीर्तन में विनोद करते देख नारदजी को शुद्र योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया। उस श्राप के फलस्वरूप नारदजी का जन्म एक शुद्र कुल में हुआ। 

जन्म लेने के बाद ही इनके पिता की मृत्यु हो गई। इनकी माता दासी का कार्य करके इनका भरण पोषण करती थी। एक दिन इनके गाँव में कुछ संत-महात्मा आये और अपना चातुर्मास बीताने के लिए वही ठहर गए। नारदजी बचपन से ही अत्यंत सुशील थे। वे खेलकूद छोड़कर उन साधुवो के पास ही बैठे रहते थे और उन साधुवो के छोटी से छोटी सेवा भी बड़ा मन लगा कर करते थे।

 संत लोग जब भगवान् की कथा का गान करते तो नारदजी तन्मयता के साथ उसे सूना करते थे। संत उन्हें अपना प्रसाद खाने को देते थे। इस प्रकार संतो के प्रभाव से नारद जी के सारे पाप धूल गए। चातुर्मास समाप्त होने के बाद जाते समय संतो ने प्रसन्न हो कर नारद जी को भगवन्नाम का जप एवं भगवान् के स्वरुप ध्यान का उपदेश दिया। इस प्रकार नारदजी भी भगवान् के भक्ति में लग गए। 

एक दिन सर्प के काटने से इनकी माँ की भी मृत्यु हो गई। माता के वियोग को भी भगवान् का परम अनुग्रह मानकर ये अनाथो के नाथ दीनानाथ का भजन करने चल पड़े। एक दिन जब नारदजी एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ कर भगवान् के स्वरुप का ध्यान कर रहे थे तब अचानक इनके ह्रदय में भगवान् प्रकट हो गए और थोड़े समय तक अपनी दिव्य स्वरुप को दिखा कर फिर अंतर्ध्यान हो गए। 

भगवान् का दोबारा दर्शन पाने के लिए नारदजी के मन में परम व्याकुलता उत्पन्न हो गई। वे बार बार अपने मन को एकाग्र कर भगवान् के उस स्वरुप का ध्यान करते पर सफल नहीं हुए। उसी समय आकाशवाणी हुई-हे दासी पुत्र! अब इस जन्म में तुम्हे मेरा दर्शन पुनः नहीं होगा। अगले जन्म में तुम मेरे पार्षद रूप में पुनः मेरे दर्शन प्राप्त करोगे।

 समय आने पर नारद जी का पञ्च भौतिक शरीर छुट गया और कल्प के अंत में ये ब्रह्माजी के मानस पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुए। देवर्षि नारद भगवान के श्रेष्ठ भक्तो में से एक है। इनकी गढ़ना द्वादश परम भागवतो में होती है। ये भगवान् की भक्ति के विस्तार के लिए निरंतर अपनी वीणा में तान भर कर अपनी मधुर वाणी से उनके कथाओ और गुणानुवादो का गान करते है।


बुधवार, 10 मई 2017

विवाह के सात वचन जो क़ि कन्या अपने होने वाले पति से लेती है!!

हमारे सनातन हिन्दू धारण के अनुसार पत्नी अपने पति से विवाह पूर्व सात वचन लेती है जिसे पति को जीवन भर निभाने का वचन देना होता है। प्रायः ये वचन विवाह संपन्न कराने वाले पंडित जी संस्कृत में या हिन्दी में पड़ कर विवाह के समय सुना देते है। आइये जाने विवाह के समय पत्नी द्वारा अपने पति से लिए जाने वाले वे सात वचन क्या है:-

1 पहला वचन (धार्मिक कार्यो में सहभागिता) :- हमारे सनातन हिन्दू धर्म में धर्म कर्म की प्रधानता है और चार पुरुसार्थ में भी धर्म का स्थान पहला है। अतः पत्नी अपने पति से पहले वचन के रूप में यह वचन लेती है की आप मुझे अपने प्रत्येक धर्म-कर्म के कार्यो में सामान सहभागी बनाएंगे। आप कोई भी पूजन भजन जप तप अथवा तीर्थ यात्रा का कोई कार्य मेरे बिना नहीं करेंगे। इस वचन का कारन यह है की पति और पत्नी के बीच सामान धर्म-कर्म कर सामान पूण्य फल की प्राप्ति करना है।

2 दूसरा वचन (अपने मायके के प्रति सम्मान) कन्या विवाह के बाद अपने पुराने परिवार को छोड़ कर अपना एक नया परिवार बसाती है, परंतु अपने मायके से उसे सामान भाव से प्रेम और स्नेह होता है। अपने दूसरे वचन में पत्नी अपने पति से यह वचन मांगती है की जिस प्रकार मै अपने पुराने घर को छोड़ कर आप के घर आ रही हूँ, आपके माता-पिता और सगे-संबंधियो को अपना रही हूँ उसी प्रकार आप भी मेरे माता-पिता और सगे संबंधियो को उसी भाव से अपनाएंगे। इस वचन का कारण यह है की पति-पत्नी के बीच परस्पर तालमेल बना रहे।

3 तीसरा वचन (हर परिस्थिति में साथ):- जीवन के तीन बड़े ही महत्वपूर्ण पड़ाव माने गए है-बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था। अगले वचन के रूप में पत्नी अपने पति से वचन लेती है की आप मेरी हर अवस्था में सामान भाव से साथ निभाएंगे। पत्नी को जीवनसंगिनी कहा जाता है अतः आप जीवन भर मेंरा साथ निभाएंगे। भविष्य में यदि मेरे साथ कोई दुर्घटना अथवा शरीरिक अक्षमता या कोई विकृति आती है तब भी आप मेरा साथ निभाएंगे। इस प्रकार तीसरे वचन से पत्नी अपने पति को अपने प्रति जिम्मेदारी का अहसास कराती है।

4 चौथा वचन (जीविकोपार्जन):- हमारे सनातन हिन्दू धर्म में मुख्यतः पति का कार्य धनोपार्जन करना और पत्नी का का कार्य गृहस्थी का संचालन करना होता है। पत्नी अपने पति से कहती है की आप मेरे और अपने परिवार की जीविकोपार्जन के लिए धर्मानुसार कर्म करते हुए धनोपार्जन कर हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करे। इस वचन के द्वारा पत्नी अपने पति को अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारी का अहसास कराती है।

5 पाचवा वचन (आर्थिक सहभागिता) पांचवे वचन के रूप में पत्नी पति से वचन लेती है की किसी भी प्रकार का कोई भी आर्थिक लेंन-देंन आप मेरी जानकारी के बाहर नहीं करेंगे। आप पारिवारिक कार्यो के संचालन में मेरी सहायता लेकर ही कोई निर्णय लेंगे। आज के परिवेश में इस वचन का महत्त्व और भी बड़ जाता है। यदि पति का कोई दुर्घटना हो जाय तब ऐसी स्थिति में पत्नी घर गृहस्थी को आगे सफलता पूर्वक चला सके इस भावना से यह वचन लिया जाता है।

6 छठवा वचन (उत्तम चरित्र) पति-पत्नी के जीवन में परस्पर एक दूसरे के प्रति सम्मान और आदर का भाव हो इस भावना से पत्नी पति से छठे वचन के रूप में अपने प्रति सम्मान का वचन लेती है। पति जीवन भर पत्नी का सम्मान करे। उससे यदि किसी प्रकार की कोई गलती भी हो जाय तो सार्वजनिक रूप से उसे अपमानित न करे एकांत में उसे समझाए। कभी अपने पत्नी का अपमान न करे। पति के उच्च चरित्र की बात करते हुए पत्नी पति को जुआ, मदिरापान, नशा, परस्त्रीगमन आदि विकारो से दूर रहने का वचन लेती है। यह वचन आज के परिवेश में बहुत आवश्यक है क्योकि आज अधिकाँश दाम्पत्य जीवन इन दुर्विकारो के कारण टूट जाते है।

7 सातवा वचन (एक पत्नी व्रत):- विवाह के बाद दाम्पत्य जीवन अपने जीवन साथी के प्रति पूर्ण समर्पण और एकात्म भाव से ही सफल होता है। अतः इस भावना से पत्नी अपने पति से वचन लेती है कि आप जीवन भर केवल मुझ से ही सम्बन्ध रखेंगे। पराई किसी स्त्री के साथ आप नाता नहीं रखेंगे। परस्त्रीगमन नहीं करेंगे। पर स्त्री को अपनी माता के सामान समझेंगे। 

हमारे सनातन हिन्दू धर्म ने विवाह को एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है। यह पति पत्नी के बीच एक पवित्र बंधन होता है जो विशवास और परस्पर सामंजस्य की बुनियाद पर होता है। विवाह का यह बंधन सनातन हिन्दू धर्म के रिति रिवाजो के साथ परिवार और समाज के उपस्थिति में संपन्न कराया जाता है। विवाह के समय अनेक प्रकार की वैवाहिक प्रक्रियाओ का पालन वर-कन्या के द्वारा किया जाता है, जिसमे एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है पत्नी के द्वारा पति से वचन लेना।

इसप्रकार विवाह के समय कन्या अपने वर से ये सात वचन लेती है ताकि उनका दाम्पत्य जीवन सुखमय हो सके। आज के इस परिवेश के हिसाब से भी ये सात वचन बहुत ही उपयोगी है क्योकि आज छोटी छोटी गलतफमियो और परस्पर सामंजस्य न होने की वजह से सम्बन्ध टूट जाते है। अतः हमारे सनातन हिन्दू धर्म के इस वैवाहिक दर्शन को समझ कर वर कन्या इन वचनो को आत्मसात कर एक सफल दाम्पत्य जीवन का निर्वहन कर सकते है।

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मंगलवार, 9 मई 2017

भगवान् के श्रीबुद्धावतार!!

बौद्ध धर्म के प्रवर्तक और महराज शुद्धोदन के यशास्वी पुत्र गौतम बुद्ध (सिद्धार्थ) के रूप में श्रीभगवान ही अवतरित हुए थे, ऐसी प्रसिद्धि विश्रुत है; परंतु पुरानवर्णित भगवान् बुद्ध देव का प्राकट्य गया के समीप कीकट देश में हुआ था। उनके पुण्यात्मा पिता का नाम 'अजन' बताया गया है। जीवो पर दया प्रकट करने और अहिंसा धर्म की स्थापना करने के लिए भगवान् बुद्ध का अवतार हुआ था। उन्होंने वेद विरुद्ध बातें कही थी अतः हम उन्हें श्रीहरि विष्णु का अवतार होने के कारण नमस्कार करते है पर उनके वचनो को अस्वीकार करते है।

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भक्त प्रह्लाद के लिए खम्भे से प्रकट हुए थे भगवान् नृरसिंह

भगवान् श्रीहरि नारायण का एक अवतार हुआ है नरसिंह। नरसिंह अवतार भगवान् के आवेशावतार है। भक्त प्रह्लाद की अकिंचन भक्ति पर द्रवित हो भगवान् ने हिरण्यकश्यप का वध करने के लिए यह विचित्र अवतार जिसमे मुख सिंह का और बाकी का शरीर मनुष्य का धारण किये। आइये जाने भगवान् के इस अवतार का रहस्य क्या है।

भगवान् श्रीहरि नारायण अपने दिव्य बैकुंठ लोक में नित्य निवास करते है और उनके द्वार पर उनके नित्य पार्षद जय-विजय द्वारपाल बने द्वार पर सेवा करते है। एक बार की बात है ब्रह्मा जी की संकल्प सृष्टि से उत्पन्न उनके मानस पुत्र सनत, सनातन, सनन्दन और सनत कुमार भगवान् विष्णु के दर्शन के लिए बैकुंठ पहुचे। द्वार पर जय-विजय द्वारपाल बने खड़े थे, जैसे ही सनकादिक भाइयो ने बैकुंठ में प्रवेश करना चाहा की जय-विजय ने उन्हें रोक दिया। इस पर सनकादिक ने उन्हें तीन जन्म तक राक्षस होने का श्राप दे दिया। 

जब यह बात भगवान् विष्णु को पता चली तब वे भी द्वार पर आ गए और सनकादिक से अपने द्वारपाल द्वारा किये गए कृत्य के लिए क्षमा मांगी और उनकी मुक्ति का उपाय पूछा। तब सनकादिक बोले की हे प्रभु ये आप के द्वारपाल है तो आप को ही इनके उद्धार के लिए धरती पर जन्म लेना पडेगा।

 इस प्रकार कालान्तर में जय-विजय के तीन अवतार-हिरण्याक्ष-हिरण्यकश्यप, रावण-कुम्भकर्ण और शिशुपाल-दंतवक्र के रूप में हुआ जिनका उद्धार भगवान् के अलग अलग वाराह, नृरसिंह, राम और कृष्णवतार ले कर किया।
भगवान् की नृरसिंह अवतार की कथा हिरण्यकश्यप से जुडी हुई है। 

जय-विजय ने पहला राक्षस स्वरुप हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप के रूप में पाया। हिरण्याक्ष ने धरती को रसातल में डूबा दिया तो भगवान् ने ब्रह्मा जी के नासिका से वाराह रूप धारण कर प्रकट हुए और हिरण्याक्ष का उद्धार किया। हिरण्याक्ष के वध से उसका भाई हिरण्यकश्यप अत्यंत क्रोध से भर उठा और विष्णु से बदला लेने का संकल्प किया। 

उसने एक कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर लिया और उनसे अमरत्व का वरदान माँगने लगा। ब्रह्माजी ने कहा की अमर में मै स्वयं ही नहीं हु तो तुम्हे कैसे अमरत्व प्रदान कर दू। तुम अमरत्व छोड़ कर कोई दूसरा वरदान मांग लो। इस पर हिरण्यकश्यप ने फिर वरदानों की झड़ी लगा दी और ब्रह्मा जी से कह उठा-

 न मै दिन में मरू न रात में।
न अस्त्र से मरू न सस्त्र से।
न मै देवताओ से मरू न दानवों से यहाँ तक की आप की बनाई हुई सृष्टि से मै किसी से न मरू।
 न मै घर के अंदर मरू न बहार।
न मै पृथ्वी पर मरू न आकाश पर।
 न मै आप के बनाय हुए बारह माह में से किसी माह में मरू।

इस प्रकार उसने वरदानों की झड़ी लगा दी। ब्रह्माजी ने उसके वचनो को सुनकर मुस्कुराये और बोले की आज तक बहुत से माँगने वाले देखे पर तुझ सा मांगने वाला नहीं पाया। पर तूने तपस्या भी दुसरो से कठिन की है इसलिए मै तुम्हे सभी वरदान देता हूँ। ब्रह्माजी ने एवमस्तु अर्थात ऐसा ही हो कहकर वहा से अंतर्ध्यान हो गए। 

उधर जब हिरण्यकश्यप तपस्या करने गया था तब उसके छोटी पत्नी कयाधु गर्भ से थी। गर्भावस्था में इन्द्र ने उसका हरण कर लिया और अपने स्वर्ग लोक ले जा रहा था की वहा उसकी भेंट नारद जी से हो गई। नारद जी ने इन्द्र को उसके इस कृत्य के लिए बहुत फटकारा और कयाधु को इन्द्र के बंधन से मुक्त कराकर अपने साथ ले गए। 

नारद जी कयाधु को नित्य भगवान् के दिव्य गुणानुवादो को सुनाते थे और गर्भ में स्थित प्रह्लाद जी उसे श्रवण करते थे इस प्रकार गर्भ से ही प्रह्लाद जी की भगवान् श्रीहरि नारायण के प्रति सहज भक्ति प्रकट हो गई। कालान्तर में जब हिरण्यकश्यप तपस्या से वापस आया तब नारद जी ने कयाधु और उसके पुत्र प्रह्लाद को सुरक्षित उसके पास पहुचा दिया। 

फिर हिरण्यकश्यप ने स्वर्ग पर आक्रमण कर इन्द्र को परास्त कर दिया और स्वर्ग सहित तीनो लोको में अपना अधिकार कर लिया और यह घोषणा करवा दी की आज से कोई भी विष्णु सहित किसी भी देवी-देवताओ की पूजा नहीं करेगा। सारे संसार में केवल मेरी ही पूजा होगी। इसप्रकार वह अपने आप को भगवान् समझने लगा। 

उधर प्रह्लाद की अवस्था धीरे-धीरे बड़ रही थी और साथ ही साथ उसकी भगवान् के प्रति भक्ति भी बढ़ती जा रही थी। यह बात जब उसके पिता को पता चली तब उसने प्रह्लाद को बहुत समझाने का प्रयत्न किया और प्रह्लाद को दैत्यों के गुरुकुल में भर्ती करा दिया। पर गुरुकुल में भी प्रह्लाद जी को हिरण्यकश्यप की भक्ति का पाठ नहीं पढाया जा सका। उल्टे प्रह्लाद जी ने अन्य विद्यार्थियो सहित अपने गुरु जी को भगवान् श्रीहरि की भक्ति का पाठ पड़ा दिया।

जब यह बात हिरण्यकश्यप को पता चली तब वह अत्यंत क्रोध से भरा हुआ प्रह्लाद को विभिन्न प्रकार की प्रताड़ना देने लगा। प्रह्लाद को पहाड़ से नीचे गिराया गया। सर्पो से भरे अंधे कुवें में फेकवाया गया, जल में डूबा कर, अग्ने से जला कर, यहाँ तक की प्रह्लाद की माँ कयाधु के हाथ से विष भरा दूध पिला कर मारने का प्रयास किया गया पर प्रह्लाद की भक्ति और भगवद् कृपा से उसका बाल भी बाँका नहीं हो सका। 

अंत में हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को स्वयं मारने का निर्णय लिया और उसे एक अपराधी की भाँती अपने राज दरबार में प्रस्तुत करने का आदेश दिया। फिर क्या था सैनिको ने प्रह्लाद को भरी सभा में ला कर एक खम्भे से बाँध दिया। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को अन्तिम बार समझाते हुए कहा की तू उस नारायण की भक्ति छोड़ मुझे भगवान् स्वीकार कर ले। 

परंतु प्रह्लाद जी ने यह कह कर कि भगवान् तो केवल श्रीहरि नारायण  ही है और मै उन्ही की भक्ति करूँगा ऐसा कहकर हिरण्यकश्यप को भगवान् मानने से मना कर दिया। इस पर हिरण्यकश्यप को बहुत क्रोध आया और उसने अपनी खड्ग प्रह्लाद पर तान दी और कहा आज तेरी मृत्यु मेरे हाथो निश्चित है देखता हूँ आज तेरी रक्षा कौन करता है, तू उस नारायण को अपना भगवान् मानता है ना, तो बता कहा है तेरा वो भगवान्, बुला उसे, बोल की आ कर वो तेरी रक्षा करे। इस पर प्रह्लाद जी ने बड़े ही विनम्र भाव से कहा की हे पिताजी वो श्रीहरि नारायण तो सभी जगह व्याप्त है, वे ही आप में है और वे ही मुझ में है, वे ही इस खड्ग में है और वे ही इस खम्भे में।

 हिरण्यकश्यप ने जैसे ही प्रह्लाद के इन वचनो को सूना क्रोध से पागल हो गया और प्रह्लाद से कहने लगा की यदि तेरा भगवान् इस खड्ग में भी है और इस खम्भे में भी तो ले आज तेरे इस खड्ग वाले भगवन से इस खम्भे वाले भगवान् का मै वध करता हूँ और अपना खड्ग उठा लिया। उधर प्रह्लाद जी ने हाथ जोड़ कर अपनी आँखे बंद कर ली और श्रीहरि का स्मरण करने लगे। हिरण्यकश्यप ने जैसे ही उस खम्भे पर अपना खड्ग का प्रहार किया की उस खम्भे से भगवान् श्रीहरि नारायण ने अपना आवेशावतार नृरसिंह के रूप में ले लिया।

भगवान् जब प्रकट हुए तब एक दिव्य तेज उनके मुख मण्डल पर छाया था। उनके इस तेज से हिरण्यकश्यप सहित सभी दैत्यों की नेत्र में अंधलकार छा गया। उनके श्रीअंग में मुख सिंह का था और वे काल को भी भयभीत करने वाली गर्जना कर रहे थे। उनका मुख अत्यंत क्रोध से भरा हुआ था मानो वे सम्पूर्ण विश्व का लय करने आये हो। उनका बाकी का श्रीअंग मनुष्य की भाँती था। 

भगवान् नरसिंह ने प्रकट होते ही हिरण्यकश्यप पर एक मुस्टिक का प्रहार किया की उसके हाथ से खड्ग जमीन पर जा गिरा। फिर दोनों के बीच द्वन्द युद्ध प्रारम्भ हो गया। भगवान् ने हिरण्यकश्यप के युद्धाभिमान को तोड़ दिये और उसे अधमरे हालत में ला दिए। भगवान् ने उसे घसीटते हुए उसके राजभवन के दहलीज पर ले आये और उसे अपनी गोद में बिठा लिए। अब भगवान् ने उसे ब्रह्मा जी के वरदानों को याद करने कहा:-

तूने दिन या रात्रि में न मरने का वरदान माँगा था तो देख अभी न दिन है न रात संध्या का समय है।

तूने अस्त्र-शस्त्र से न मारने का वर माँगा था तो मेरे ये नाखून न अस्त्र है न शस्त्र।

तूने ब्रह्मा की सृष्टि में किसी से न मारने का वर माँगा था तो मुझे ब्रह्मा ने नहीं अपितु मैंने ब्रह्मा को पैदा किया है।

तूने घर के भीतर या बहार न मरने का वर माँगा था तो इस समय तू न घर के बहार है न भीतर बल्कि देहलीज पर है।

तूने धरती, आकाश या पाताल में न मरने का वर माँगा था तो तू न धरती पर है न आकाश में इस समय तू मेरी गोद में है।

तूने बारह महीने में से किसी महीने में न मरने का वर माँगा था तो अभी बाड़ मास चल रहा है।

इस प्रकार भगवान् नृरसिंह ने हिरण्यकश्यप को सारे वरदान गिनाये और उसके विरुद्ध उसकी वध का उपाय कहा और अपने हाथ को ऊपर कर उंगलियो से नखों को प्रकट किया और हिरण्यकश्यप की छाती पर अपने नखों को गड़ा दिया और छाती को फाड़ते हुए उसका वध कर दिया। भगवान् के हाथ हिरण्यकश्यप के रक्त से तर तो गए। 

हिरण्यकश्यप का वध करने के उपरान्त भी भगवन का क्रोध शांत नहीं हुआ तब देवताओ ने आ कर उनकी स्तुति की पर भगवान् की क्रोध के आगे अधिक समय नहीं ठहर सके। फिर ब्रह्मा जी ने आ कर स्तुति की पर वे भी भगवान् के क्रोध को शांत नहीं कर पाये बल्कि ब्रह्मा जी ने ही ऐसा विचित्र वरदान हिरण्यकश्यप को दिया है यह जान कर उन पर और भी क्रोधित हुए। फिर भगवान् शंकर ने उनके क्रोध को शांत करना चाहा पर भगवान् शांत नहीं हुए। 

इस पर देवताओ ने बैकुंठ जा कर माता लक्ष्मी से प्रार्थना की कि हे माता प्रभु ने विचित्र नृरसिंह स्वरुप धारण किया है और उनके क्रोध की अग्नि से सम्पूर्ण सृष्टि जल कर भस्म होने को है अतः आप चल कर भगवान् ले इस क्रोध को शांत करने की कृपा करे। माता लक्ष्मी देवताओ के साथ हिरण्यकश्यप के उस राज भवन में आई और प्रार्थना करने जैसे ही आगे बड़ी की भगवान् ने एक जोर की हुंकार भरी और माता लक्ष्मी भयभीत हो कर वापस चली गई। 

सभी ने प्रयास करके देख लिया पर किसी ने भी भगवान् के क्रोध को शांत नहीं कर पाया। अंत में शिवजी ने युक्ति निकाली की प्रभु ने यह विकराल स्वरुप भक्त प्रह्लाद के लिए धारण किया है अतः प्रह्लाद ही उनके इस क्रोध को शांत कर सकता है। ऐसा विचार कर प्रह्लाद को भगवान् के सामने स्तुति करने भेज दिया।

प्रह्लाद जी को जैसे ही भगवान् ने देखा तो उनका कुछ क्रोध शांत हुआ और उन्होंने प्रह्लाद को अपने निकट बुला कर अपनी गोद में बिठा लिया और प्रह्लाद पर भगवान् का वात्सल्य इतना उमड़ा की वे अपनी जीभ निकालकर प्रह्लाद को चाटने लगे। भगवान् के इस अत्यंत ममतामयी व्यवहार के कारण उन्हें भक्त वत्सल कहा जाने लगा। भगवान् ने बहुत समय तक अनेक प्रकार से बिना कुछ बोले प्रह्लाद पर अपना दुलार लुटाते रहे। 

फिर प्रह्लाद से बोले की हे पुत्र तुमने इतनी छोटी सी अवस्था में केवल मेरा नाम लेने के कारण इतना कष्ट सहा है और मुझे आने में कितनी देर हो गई। भगवान् ने कहा की तुम से पहले किसी ने भी मेरा नाम लेने के कारण ऐसी यातनाये नहीं सही है हे पुत्र तुम मुझे क्षमा कर दो कहा तो भगवान् के क्रोध को सभी देवी देवता मिलकर भी शांत नहीं कर पाये और प्रह्लाद जी को देख कर भगवान् नरसिंह का क्रोध भी शांत हो गया और वो अपने भक्त से क्षमा माँगने लगे। भगवान् ने प्रह्लाद से कहा कि हे पुत्र मेरे इस स्वरुप के सामने कोई देवी देवता भय वश सामने नहीं आ सके फिर कहे वो मेरे बेटे ब्रह्मा हो या शंकर जी हो या मेरी पत्नी रमा हो कोई भी मेरे इस स्वरुप से डर कर सामने नहीं आ सका पर तुम बिना किसी भय के मेरे सामने आ गए। 

प्रह्लाद ने कहा की हे प्रभु मै सर्वत्र आप का ही दर्शन करता हूँ फिर कहे वह कोई मनुष्य हो देवता हो पशु हो या निर्जीव खम्भ हो मै सभी जगह आप का ही स्वरुप देखता हूँ, और प्रभु आप भय की बात करते है तो आप को पता होगा कि सिंह से गीदड़ को डर लगता है सिंह के शावक को नहीं। मै तो आप का ही पुत्र हूँ तो आप से कैसा डर।

 भगवान् प्रह्लाद के इन बातो से अत्यंत प्रसन्न हुए। फिर भगवान् ने प्रह्लाद से वर माँगने को कहा। प्रह्लाद ने कहा की हे प्रभु मनुष्य के दुःख का प्रमुख कारण कामनाये है और आप मुझे वरदान माँगने को कह रहे है। मुझे कोई वर नहीं चाहिए। आप मुझे वरदान देना ही चाहते है तो ऐसा आशीर्वाद दीजिये की मेरे मन में कोई कामनाये न आये। 

भगवान् ने कहा की पुत्र तू मेरा परम भक्त है तेरे मन में किसी प्रकार की कामनाये आ ही नहीं सकती। फिर भी तू मेरी प्रसन्नता के लिए कुछ मांग। प्रह्लाद जी ने जमीन पर पड़े हुए अपने पिता हिरण्यकश्यप की तरफ देखा और भगवान् से बोले की हे प्रभु यदि आप मुझ पर प्रसन्न है और कुछ देना चाहते है तो मुझे वर दीजिये की मेरे पिता की अधोगति न हो। उन्होंने जैसे भी अपराध किया हो उन सभी से उन्हें मुक्त कर उन्हें अपना दिव्य कृपामयी आशीर्वाद प्रदान करे। 

भगवान् ने कहा की तुम धन्य हो प्रह्लाद की जिसने तुम्हे इतना कष्ट दिया उसके लिए तुम्हारे मन में ऐसी भावना है। फिर भगवान् ने कहा की जो प्रह्लाद जैसे पुत्र का पिता हो उसकी अधोगति तो हो ही नहीं सकती। भगवान् ने प्रह्लाद को आशीर्वाद दिया और अपनी दिव्य भक्ति प्रदान की।

इस प्रकार भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए भगवान् ने वैशाख शुक्ल चतुर्दशी के दिन सायं काल में नृरसिंह अवतार धारण किया था।

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